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Tuesday, June 7, 2022

जिद्द


बरसों पहले ही 

हम

एक दूजे के

घर के मेहमान 

बन जाते

अगर

*माँ*

जिद्द ना करती !


गौरव कुमार *विंकल*







Wednesday, May 25, 2022

"माँ" ने कहा था...

    माँ ने 
    एक रोज़ 
    ये कहा था,

   "जब बच्चे बड़े हो जाएं ,
    तो माँ बाप को, 
    मर जाना चाहिए"

   गौरव कुमार *विंकल*





Sunday, May 22, 2022

मेरा अहम !

माँ को अहसास है 
जो मेरे पास है 
वो चाहता नहीं पास रहना 

माँ बहुत उदास है 
क्या बात है 
वो चाहती नहीं कहना 
पिताजी सोचते हैं 
खुद को कोसते हैं 
वो गलत थे 
उनकी सोच.....

माँ सोचती है 
अपनी कोख को कोसती है 
जो हुआ गलत हुआ.....

मैं सोचता हूँ
मेरा मरना 
उनके
मरने जैसा होगा

उनका गुजर जाना 
मेरा अहम भी 
नहीं तोड़ पायेगा.....

गौरव कुमार *विंकल*

Saturday, May 21, 2022

माँ अकेली है ...

जब बाहर 
शहर से बाहर होता हूं
तो सोचता हूं माँं अकेली है
अब कहां उसकी सहेली है।

माँ जानती है
चाहे
मुझे पहचानती है
नादान हूं

पर मैं जवान हूं
अब तो मुझे समझना चाहिए
खुदको इस घड़ी में परखना चाहिए
दिल में ये ख़्याल रखना चाहिए

इसके लिए भी 
क्या निकालना कोई मुहूर्त है
की माँ को मेरी ज़रूरत है
अब मुझे चलना चाहिए।

गौरव कुमार *विंकल*

Thursday, October 22, 2009

माँ का दिल दुखाया क्योँ ?...

जिन्दगी के सफर में हर कदम पर जिसने तेरा साथ दिया


उस पर हुक्म चलाया क्योँ ?

माँ का दिल दुखाया क्योँ ?


खुश रखा जिसने तुझको आँख में आंसू ना आने दिया

उसकी आँख में आंसू लाया क्योँ ?

माँ का दिल दुखाया क्योँ ?


अपनी हस्ती भी लुटादी जिसने तेरे सपनों को पूरा करने के लिए

उसके सपनों का घर जलाया क्योँ ?

माँ का दिल दुखाया क्योँ ?


हजारों गम सहन किये जिसने तेरे इक सजदे के बदले

विंकल घर छोड़कर आया क्योँ ?

माँ का दिल दुखाया क्योँ ?

तब रोयी बहुत माँ की आंखें ...

जब डरा गयी बेटे की आँखें


तब रोयी बहुत माँ की आंखें



असहाय बनकर देखती रही वो

गहरी झुरिओं वाली बाबुल की आँखें



शायद उस वक्त वो सो चुकी थी

आसमां पर बैठे अल्लाह की आँखें



कोमल हाथों से आई अश्क पोछने

बेहद सीलन भरी बेटी की आंखें



कविता लिखते वक्त क्या कहूँ

कितनी रोयी थी विंकल की आंखें

Tuesday, October 20, 2009

वो माँ की ऑंखें थी .....

जब खडा था रसोई में


तो लगा

माँ आवाज देगी

गर्म-गर्म बन रही है रोटी

ले बेटा खाले

देख कैसे उठ रही है भाप

गर्म सब्जी से

है ना मजेदार

और

मैंने कह दिया

हूँ

आज माँ मजा ही आ गया

यकायक

मैंने आँखों से आंसू पोंचे

स्टील की थाली में से

दो आँखें

मुझे रोती हुई

ताक रही थी

शायद

वो माँ की ऑंखें थी .....

Friday, September 18, 2009

बचपन की यादें .......... माँ की बातें


बचपन  की  यादें  वक्त  के  फंदे  पर कभी झूलती नही
माँ की बातें और लोरियां मुझे कभी भूलती नहीं

तसवीरें देखता हूँ जो दीवारों पर कब से लटकी हैं
माँ संग बैठी है ये देख आँखें टपकी है

 बेकार की बात नहीं मैं सच कह रहा हूँ
माँ की यादों के संग मैं बह रहा हूँ

माँ को गले लगाये हुए एक और तस्वीर है
ये सब तसवीरें ही तो मेरी जागीर है

कभी नहीं खाली हो सकता खामोशी का समंदर
मुझे विरासत में मिला था सुहाना सा मंजर

हाथ पकडा हुआ था माँ ने मेरा तब भी
हाथ पकडा हुआ है माँ ने मेरा अब भी


चार दीवारें हैं उस पर डाली हुयी छत है
माँ का ये कमरा उसका जीवन रुपी रथ है

सदा दी है दुआ, बेटा हमेशा आगे बढना
माँ तुम्हें कभी रुलाया हो तो मुझे माफ़ करना.