सच का हत्यारा, कब तक
झूठ छल का मारा कब तक
सूरज बन तू उजियारा बांट
यूं, रात का तारा, कब तक
आंसू, खुशी के ही जचते हैं
समंदर खारा खारा, कब तक
बीच भंवर तो उतरकर देख
साहिल से नज़ारा, कब तक
नेकी की राह पे चल "विंकल"
ये बदी का सहारा, कब तक
गौरव कुमार *विंकल*