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Thursday, February 9, 2023
Saturday, July 9, 2022
वक़्त से बेहतर
तू ख़ुशी की बजाय देख
बस ग़म की सराय देख
छाँव अपने सरपर ही
धूप फिरे उठाए देख
वक़्त से बेहतर दुनियां में
कौन भला समझाए देख
सोच सोच के जीने वाला
बेमौत ही मर जाए देख
सच को अनदेखा करके
विंकल खूब पछताए देख
गौरव कुमार *विंकल*
Wednesday, July 6, 2022
ख्वाहिश
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बातों के जंगल से बातों को पकड़ा है
अँधेरों में गुमशुदा रातों को पकड़ा है
दिल से होकर जो आँखों से निकली
बूँद बूँद बरसती बरसातों को पकड़ा है
ख्वाहिश ए जन्नत जो जहन्नुम ले गई
नादान गुनहगारों के हाथों को पकड़ा है
मुकद्दर में कभी किसी से कर ना पाया
ऐसी ख्वाहिश भरी मुलाकातों को पकड़ा है
वो कुछ तो बने खोलके जिन्होंने है पढ़ी
"विंकल" ने तो बस किताबों को पकड़ा है
गौरव कुमार *विंकल*
Sunday, July 3, 2022
बुनियाद
रात सहर तक है
धूप दोपहर तक है
गीदड़ कब तक दौड़ेगा
दौड़ शहर तक है
मीठे बोल कैसे बोले
सोच ज़हर तक है
इस दुनिया की बुनियाद
कुदरती कहर तक है
जमीं से रिश्ता जोड़े रख
'विंकल' बुलंदी लहर तक है
©गौरव कुमार *विंकल*
Tuesday, June 7, 2022
एक पंक्ति में
रात, एक पंक्ति में
बात, एक पंक्ति में
पल मे छूटा बरसों का
साथ, एक पंक्ति में
हमने मुक्कमल कर दी
मुलाकात, एक पंक्ति में
अब तुम्हें क्या बताएं
हयात, एक पंक्ति में
ज़ाहिर ना होंगे विंकल
जज़्बात, एक पंक्ति में
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, May 28, 2022
चिराग़ ...
'मैं जा रहा हूं घूमने'
कांपती हुई आवाज़ बोली,
'जिधर भी जा मुझे परवाह नहीं'
अंधेरे में जल रहा था
रजाई के क़रीब
कुर्सी की बाजू पर
क्या वो ,
कंपकपाता बुझ गया होगा?
चिराग़ अंधेरे में!
गौरव कुमार *विंकल*
Friday, May 27, 2022
चलते चलते ...
अश्क संभाले गिरते - गिरते
ऊंचाई पर ही उतरन थी
उतर गया वो चढ़ते - चढ़ते
बरसों बाद , बात पुरानी
याद आ गई चलते - चलते
मन की हालत ठीक नहीं
हल ढूंढे दिन ढलते - ढलते
विंकल मुखातिब है हिज़्र से
मर जायेगा आह भरते-भरते
गौरव कुमार *विंकल*
Thursday, May 26, 2022
संभाल लो ...
बिगड़ते हालात संभाल लो
तुम रातो रात संभाल लो
किसी पर भी उठ जाते है
ये अपने हाथ संभाल लो
दूर तलक जाने से पहले
घर पे ही बात संभाल लो
सैलाब ना आ जाए कहीं
आयी बरसात संभाल लो
पीढ़ियों तक चलेंगे *विंकल*
ज़रूरी कागज़ात संभाल लो
गौरव कुमार *विंकल*
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