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Sunday, October 30, 2022

अबोध बालक

एक पग कर्म चले 
एक पग धर्म चले

मृत्यु के समक्ष देख
पग पग जन्म चले

मन अबोध बालक
हो मस्त मग्न चले

झूठ के गर्भ में
सत्यता परम चले

सूर्यास्त के पश्चात
चांद, तारों संग चले

गौरव कुमार *विंकल*

Saturday, June 4, 2022

अपनापन


अगर तन से अच्छा मन होता
फिर खुद का ना दुश्मन होता

नाम तेरा जो कभी भज लेता
फिर खाली न यह बर्तन होता

देख आना जाना कौन भोगता
गर चौरासी का ना बंधन होता

मोह माया में ना फंसता जो
सब कुछ तुझको अर्पण होता

खतायें बख्श देता विंकल की
गर जरा भी अपनापन होता

गौरव कुमार *विंकल*

Thursday, June 2, 2022

मन ...



मन प्रश्नों तक ही सीमित है

उसका ऐसा होना नियमित है


क्षण भर वो उल्लास मनाता

क्षण भर में वो चिंतित है


तन पर वश मन का ही

मूर्छित सा कभी जीवित है


धावक वो ब्रह्मांड में ऐसा

जो वेदों में भी अंकित है


वक्त बेवक्त कहता लिखने को

वो विंकल को करता भ्रमित है 


गौरव कुमार *विंकल*





Monday, May 30, 2022

मन की गागर


बदरा बदरा लड़ पड़े

बरखा बरखा कर पड़े


धूप बुझी आंगन से

श्याम रंग उमड़ पडे़


बरसों से लगे हुये

शाख से पत्ते झड़ पड़े


अहम से ठोकर खाके

स्वपन बीच भंवर पड़े


मन की गागर से अश्रु

बूँद बूँद निकल पड़े


गौरव कुमार *विंकल*