एक पग कर्म चले
एक पग धर्म चले
मृत्यु के समक्ष देख
पग पग जन्म चले
मन अबोध बालक
हो मस्त मग्न चले
झूठ के गर्भ में
सत्यता परम चले
सूर्यास्त के पश्चात
चांद, तारों संग चले
गौरव कुमार *विंकल*
उसका ऐसा होना नियमित है
क्षण भर वो उल्लास मनाता
क्षण भर में वो चिंतित है
तन पर वश मन का ही
मूर्छित सा कभी जीवित है
धावक वो ब्रह्मांड में ऐसा
जो वेदों में भी अंकित है
वक्त बेवक्त कहता लिखने को
वो विंकल को करता भ्रमित है
गौरव कुमार *विंकल*
बदरा बदरा लड़ पड़े
बरखा बरखा कर पड़े
धूप बुझी आंगन से
श्याम रंग उमड़ पडे़
बरसों से लगे हुये
शाख से पत्ते झड़ पड़े
अहम से ठोकर खाके
स्वपन बीच भंवर पड़े
मन की गागर से अश्रु
बूँद बूँद निकल पड़े
गौरव कुमार *विंकल*