Thursday, February 9, 2023
Sunday, October 30, 2022
अबोध बालक
एक पग कर्म चले
एक पग धर्म चले
मृत्यु के समक्ष देख
पग पग जन्म चले
मन अबोध बालक
हो मस्त मग्न चले
झूठ के गर्भ में
सत्यता परम चले
सूर्यास्त के पश्चात
चांद, तारों संग चले
गौरव कुमार *विंकल*
Friday, October 7, 2022
कब तक
सच का हत्यारा, कब तक
झूठ छल का मारा कब तक
सूरज बन तू उजियारा बांट
यूं, रात का तारा, कब तक
आंसू, खुशी के ही जचते हैं
समंदर खारा खारा, कब तक
बीच भंवर तो उतरकर देख
साहिल से नज़ारा, कब तक
नेकी की राह पे चल "विंकल"
ये बदी का सहारा, कब तक
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, July 9, 2022
वक़्त से बेहतर
तू ख़ुशी की बजाय देख
बस ग़म की सराय देख
छाँव अपने सरपर ही
धूप फिरे उठाए देख
वक़्त से बेहतर दुनियां में
कौन भला समझाए देख
सोच सोच के जीने वाला
बेमौत ही मर जाए देख
सच को अनदेखा करके
विंकल खूब पछताए देख
गौरव कुमार *विंकल*
Wednesday, July 6, 2022
ख्वाहिश
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बातों के जंगल से बातों को पकड़ा है
अँधेरों में गुमशुदा रातों को पकड़ा है
दिल से होकर जो आँखों से निकली
बूँद बूँद बरसती बरसातों को पकड़ा है
ख्वाहिश ए जन्नत जो जहन्नुम ले गई
नादान गुनहगारों के हाथों को पकड़ा है
मुकद्दर में कभी किसी से कर ना पाया
ऐसी ख्वाहिश भरी मुलाकातों को पकड़ा है
वो कुछ तो बने खोलके जिन्होंने है पढ़ी
"विंकल" ने तो बस किताबों को पकड़ा है
गौरव कुमार *विंकल*
Sunday, July 3, 2022
बुनियाद
रात सहर तक है
धूप दोपहर तक है
गीदड़ कब तक दौड़ेगा
दौड़ शहर तक है
मीठे बोल कैसे बोले
सोच ज़हर तक है
इस दुनिया की बुनियाद
कुदरती कहर तक है
जमीं से रिश्ता जोड़े रख
'विंकल' बुलंदी लहर तक है
©गौरव कुमार *विंकल*
Tuesday, June 28, 2022
चेहरे
कुछ बंद रहे किताब से चेहरे
दीदार होते ही चुभे रे कुछ
खार-सने हैं गुलाब से चेहरे
संगमरमर या कोयले जैसे
खुदा बनाता हिसाब से चेहरे
सवाल बन फिरता रहा कभी
मुझको मिले जवाब से चेहरे
उजालों में विंकल थे तेरे जो
अँधेरे में बिछड़े ख्वाब से चेहरे
गौरव कुमार *विंकल*
Friday, June 24, 2022
चाय मट्ठी मेरी तरफ़ से
धीमी आंच पे पक रहा था
भड़की भट्ठी, मेरी तरफ़ से
तू लाख मना, अब मुझको
पक्की कट्टी, मेरी तरफ़ से
ज़ख़्म मैंने दिया है तो फिर
मलहम पट्टी, मेरी तरफ़ से
चाहे पानी भी न पूछ मुझे
चाय मट्ठी, मेरी तरफ़ से
विंकल कड़वी यादें दे गया
मीठी बट्टी, मेरी तरफ़ से
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, June 18, 2022
जीवन चक्र
निकलता हूँ जब
घर से कमाने
याद आ जाते हैं
वो जमाने
जब आप भी काम को जाते थे
आते हुये खाने को कुछ लाते थे
आज मैं भी उसी दौर में हूँ
मुझसे भी वही उम्मीदें है
आप हमारे लिये जीते थे
अब हम उनके लिये जीते हैं
जीवन चक्र चल रहा है
वक्त आप की दुआ से
अच्छा निकल रहा है
आज एक पुत्र,
पिता की भांति
अपने फर्ज निभा रहा है
पर आप सा बन पाना
मुमकिन नहीं !
गौरव कुमार *विंकल*
Wednesday, June 15, 2022
जंगल में आग
वो एक अफवाह उड़ाते हैं
जंगल में आग लगाते हैं
नादानों की फेहरिस्त बनाके
पत्थर हाथों में थमाते हैं
खून में गर्मी है जिनके
जलसे में उन्हें बुलाते हैं
तेरा मजहब सबसे बड़ा
ये कहकर उकसाते हैं
मजबूरों की मजबूरी का
कुछ वो फायदा उठाते हैं
हुक्मरान हैं जो *विंकल*
अल्लाह राम को लड़वाते हैं
गौरव कुमार *विंकल*
Monday, June 13, 2022
साज़िश से जीतेगा
हां, कोई भी झूठा नहीं है
बस एक तू सच्चा नहीं है
सब जानता है दिल तेरा
अब तू कोई बच्चा नहीं है
साज़िश से जीतेगा, छी
ये बिल्कुल अच्छा नहीं है
हेर फेर तू जितना भी कर
हिसाब उसका कच्चा नहीं है
पागल लोग कहेंगे *विंकल*
चाहे पागल तू लगता नहीं है
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, June 11, 2022
खुद से वादा कर
जीवन अपना सादा कर
जरूरतों को आधा कर
जुबान पर लगाम रख
यूं पार ना मर्यादा कर
सब बुरे विचार त्याग दे
नेक अपना ईरादा कर
गलतियों को मान जा
बहस ना तू ज्यादा कर
मन किसी का मत दुखाना
विंकल खुद से वादा कर
गौरव कुमार *विंकल*
Tuesday, June 7, 2022
एक पंक्ति में
रात, एक पंक्ति में
बात, एक पंक्ति में
पल मे छूटा बरसों का
साथ, एक पंक्ति में
हमने मुक्कमल कर दी
मुलाकात, एक पंक्ति में
अब तुम्हें क्या बताएं
हयात, एक पंक्ति में
ज़ाहिर ना होंगे विंकल
जज़्बात, एक पंक्ति में
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, June 4, 2022
अपनापन
फिर खुद का ना दुश्मन होता
नाम तेरा जो कभी भज लेता
फिर खाली न यह बर्तन होता
देख आना जाना कौन भोगता
गर चौरासी का ना बंधन होता
मोह माया में ना फंसता जो
सब कुछ तुझको अर्पण होता
खतायें बख्श देता विंकल की
गर जरा भी अपनापन होता
गौरव कुमार *विंकल*
Thursday, June 2, 2022
मन ...
मन प्रश्नों तक ही सीमित है
उसका ऐसा होना नियमित है
क्षण भर वो उल्लास मनाता
क्षण भर में वो चिंतित है
तन पर वश मन का ही
मूर्छित सा कभी जीवित है
धावक वो ब्रह्मांड में ऐसा
जो वेदों में भी अंकित है
वक्त बेवक्त कहता लिखने को
वो विंकल को करता भ्रमित है
गौरव कुमार *विंकल*
Monday, May 30, 2022
मन की गागर
बदरा बदरा लड़ पड़े
बरखा बरखा कर पड़े
धूप बुझी आंगन से
श्याम रंग उमड़ पडे़
बरसों से लगे हुये
शाख से पत्ते झड़ पड़े
अहम से ठोकर खाके
स्वपन बीच भंवर पड़े
मन की गागर से अश्रु
बूँद बूँद निकल पड़े
गौरव कुमार *विंकल*
Saturday, May 28, 2022
चिराग़ ...
'मैं जा रहा हूं घूमने'
कांपती हुई आवाज़ बोली,
'जिधर भी जा मुझे परवाह नहीं'
अंधेरे में जल रहा था
रजाई के क़रीब
कुर्सी की बाजू पर
क्या वो ,
कंपकपाता बुझ गया होगा?
चिराग़ अंधेरे में!
गौरव कुमार *विंकल*
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