Sunday, July 3, 2022

बुनियाद

रात सहर तक है
धूप दोपहर तक है

गीदड़ कब तक दौड़ेगा
दौड़ शहर तक है

मीठे बोल कैसे बोले
सोच ज़हर तक है

इस दुनिया की बुनियाद
कुदरती कहर तक है

जमीं से रिश्ता जोड़े रख
'विंकल' बुलंदी लहर तक है

©गौरव कुमार *विंकल*

6 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज सोमवार(०४-०७-२०२२ ) को
    'समय कागज़ पर लिखा शब्द नहीं है'( चर्चा अंक -४४८०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. बहुत सुंदर मनमोहक सृजन। सुदर्शन रत्नाकर

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