जीवन अपना सादा कर
जरूरतों को आधा कर
जुबान पर लगाम रख
यूं पार ना मर्यादा कर
सब बुरे विचार त्याग दे
नेक अपना ईरादा कर
गलतियों को मान जा
बहस ना तू ज्यादा कर
मन किसी का मत दुखाना
विंकल खुद से वादा कर
गौरव कुमार *विंकल*
उसका ऐसा होना नियमित है
क्षण भर वो उल्लास मनाता
क्षण भर में वो चिंतित है
तन पर वश मन का ही
मूर्छित सा कभी जीवित है
धावक वो ब्रह्मांड में ऐसा
जो वेदों में भी अंकित है
वक्त बेवक्त कहता लिखने को
वो विंकल को करता भ्रमित है
गौरव कुमार *विंकल*